भारतीय हॉकी टीम की वर्दी की जर्सी केसरिया रंग को लेकर देश में जो विवाद छिड़ा हुआ है वह निरर्थक इस वजह से है कि रंग का अपना कोई धर्म नहीं होता। किसी भी रंग के प्रतीकों का प्रयोग किसी भी धर्म में हो सकता है जिससे उसके अनुयायियों की पहचान नहीं की जा सकती। इसके बावजूद कुछ रंगों का विशिष्ट महत्व होता है जिनकी राष्ट्रीय पहचान भी होती है। भारत में एेसा ही रंग केसरिया है, जो त्याग, बलिदान व समर्पण का प्रतीक माना जाता है। मगर इसे गलती से हिन्दू रंग समझ लिया गया है जो कि पूर्णतः निराधार है क्योंकि केसरिया रंग का इस्लाम धर्म में भी प्रयोग होता रहा है। रंगों का साम्प्रदायिकरण करके हम केवल संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचय ही देते हैं क्योंकि केसरिया या नारंगी रंग भारतीय संस्कृति में सृजन का भी प्रतीक है। यह शुभ कार्यों में प्रकृति के महात्म्य को भी दर्शाता है और इस्लाम में भी प्रकृति की विशेष महत्ता है। यह बेवजह नहीं है कि इस्लामी स्थापत्य की कल्पना बिना बाग-बगीचों के नहीं की जा सकती है। भारत में तो सामाजिक कार्यों में भी बिना धार्मिक भेदभाव के केसरिया रंग को विशेष महत्व दिया गया है और इसका प्रभाव इतना गहरा है कि पाकिस्तान के पंजाब के साथ भारतीय पंजाब में भी आज तक ब्याह-शादी के मौके पर महिलाएं नव वधू की वेशभूषा का बखान केसरिया चुन्नी के साथ करती हैं। पंजाब के लोकगीतों में शादी के अवसर पर महिलाएं जो गीत गाती हैं उनमें केसरिया रंग की चुन्नी में ही बहू या नूह का वर्णन किया जाता है।
‘चुन्नी केसरी ते गोटे दियां तारियां’
यह लोक गीत पाकिस्तान के पंजाब में आज भी शादी के अवसर पर महिलाएं गाती हैं जो कि नव वधू के शृंगार का अभिन्न अंग होती है। अतः भारत में हाकी टीम की जर्सी का रंग नीले से केसरिया किया जाने पर कुछ लोग जो शोर मचा रहे हैं और आलोचना कर रहे हैं वे भारत की मूल संस्कृति के रंग से कटे हुए समझे जा सकते हैं। कहा जा रहा है कि जर्सी का रंग नीले से नारंगी किये जाने के बारे में हाकी खिलाड़ियों व विशेषज्ञों से कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया। कुछ लोग इसे भगवाकरण अभियान बता रहे हैं, जबकि वास्तव में एेसा कुछ भी नहीं है क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय मैचों में हाकी अब हरे घास के मैदान पर नहीं बल्कि प्लास्टिक के नीले-आसमानी रंग के एस्ट्रो टर्फ पर खेली जाती है जिसमें भारतीय टीम को अपने पक्ष के खिलाडि़यों की पहचान करने में दिक्कत आती थी। हाकी के खेल में खिलाड़ियों में आपस का तालमेल बहुत मायने रखता है। मैच की हारजीत का फैसला गोलों से तो होता है मगर इन्हें दागने में खिलािड़यों के बीच ‘पास’ देकर ही लक्ष्य की प्राप्ति की जाती है जिसमें अपने पक्ष के खिलाड़ी की दूर से ही पहचान होना बहुत आवश्यक होता है अतः भारतीय हाकी फेडरेशन के अध्यक्ष श्री दिलीप तिर्की ने स्पष्ट किया है कि जर्सी का रंग बदलने का फैसला पूरी तरह तकनीकी कारणों से किया गया है (श्री तिर्की स्वयं में एक समय में भारतीय हाकी टीम के कप्तान रहे हैं और राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं) नीली जर्सी का रंग मैदान की सतह के रंग के साथ घुल-मिल जाता था जबकि अन्तर्राष्ट्रीय मैचों के लिए अब नीले रंग के एस्ट्रो टर्फ मैदान ही मान्य है। इससे साफ हो जाना चाहिए कि भारत ने केसरिया रंग की जर्सी का चुनाव क्यों किया है।
अगले महीने बेल्जियम व नीदरलैंड में पुरुष व महिला विश्व कप हाकी मैच होने हैं जिनसे भारतीय पुरुष व महिला टीमें केसरिया जर्सी ही पहनेंगी लेकिन भारत के इस फैसले का पूर्व हाकी खिलाड़ी परगट सिंह व धनराज पिल्लै ने विरोध किया है और सिंह ने तो इसे भगवाकरण बताने में भी हिचक नहीं दिखाई। किन्तु इन दोनों खिलाड़ियों को श्री दिलीप तिर्की के तर्क पर भी गौर फरमाना चाहिए था। देश की आजादी के आन्दोलन से लेकर आज खेलों तक में केसरिया रंग की महत्ता को स्थान दिया जा रहा है तो इसे भगवाकरण किस दृष्टि से कहा जा सकता है। आजादी के आन्दोलन में जब क्रान्तिकारी यह गीत गाते हुए फांसी के तख्ते पर झूलते थे।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला
तो उनके मन में केवल देश पर मर मिटने का जज्बा होता था। वैश्विक खेल स्पर्धाओं में भी खिलाड़ी देश के सम्मान के लिए अपनी जी-जान लड़ा देते हैं तो उनकी जर्सी के रंग पर अनावश्यक विवाद क्यों पैदा किया जाये? नीदरलैंड में आगामी 15 अगस्त से महिला विश्व कप हाकी शुरू होगी और बेल्जियम में पुरुष हाकी। महिला हाकी टीम का नेतृत्व सलीमा तेते करेंगी और पुरुष टीम का हरमनप्रीत सिंह। ये टीमें भारत की होंगी और इनकी जर्सी का केसरिया रंग भारतीयता की पहचान के रूप में देखा जायेगा। आखिरकार भारतीय हाकी फेडरेशन ने भी तो गंभीर चिन्तन-मनन और विचार-विमर्श के बाद ही रंग बदलने का फैसला लिया होगा। जिस प्रकार रंग का कोई धर्म नहीं होता उसी प्रकार खेल का भी कोई धर्म नहीं होता। यहां तक कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति संगीत में भी धर्म के कोई मायने नहीं होते। अगर धर्म के हिसाब से संगीत चलता तो आज भारतीय संगीत वाद्य यन्त्रों के पुरातन विरासत को मुस्लिम संगीत फनकार क्यों संभाले हुए दिखाई देते?
हॉकी टीम की जर्सी का ‘रंग’
Summary :
भारतीय हॉकी टीम की वर्दी की जर्सी केसरिया रंग को लेकर देश में जो विवाद छिड़ा हुआ है वह निरर्थक इस वजह से है कि रंग का अपना कोई धर्म नहीं होता। किसी भी रंग के प्रतीकों का प्रयोग किसी भी धर्म में हो सकता है जिससे उसके अनुयायियों की पहचान नहीं की जा सकती। इसके बावजूद कुछ रंगों का विशिष्ट महत्व होता है जिनकी राष्ट्रीय पहचान भी होती है। भारत में एेसा ही रंग केसरिया है, जो त्याग, बलिदान व समर्पण का प्रतीक माना जाता है। मगर इसे गलती से हिन्दू रंग समझ लिया गया है जो कि पूर्णतः…



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