अगर हम विश्व इतिहास पर नजर डालें तो पिछली सदियों का इतिहास दुनिया के तमाम देशों पर कुछ चुिनन्दा यूरोपीय देशों के साम्राज्यवादी अधिपत्य का इतिहास रहा है और इस बीच तुर्की में स्थापित शक्तिशाली उस्मानिया साम्राज्य के वर्चस्व की गाथा भी कहता रहा है। दूसरी तरफ यह दौर विश्व में औद्योगिक क्रान्ति का भी दौर रहा है जिसके चलते यूरोपीय देशों ने अपनी व्यापार बुद्धि के बल पर एशिया व अफ्रीका समेत दूसरे महाद्वीपों के देशों पर भी अपना साम्राज्य स्थापित किया और इनके समुद्री मार्गों पर अपना कब्जा जमाया। इनमें ब्रिटेन से लेकर फ्रांस व नीदरलैंड से लेकर पुर्तगाल जैसे देश शामिल थे।
इनमें से ब्रिटेन पहले नम्बर पर था जिसने अमरीका जैसे देश तक पर अपना राज कायम करने में सफलता प्राप्त कर ली थी, परन्तु कालान्तर में 17वीं सदी में ही ब्रिटेन को इस देश से अपना कब्जा छोड़ना पड़ा, परन्तु इसके बाद एशिया व अफ्रीका के अधिसंख्य देशों पर इसका कब्जा बना रहा। इस सन्दर्भ में यह नहीं भूलना चाहिए कि 17वीं सदी के शुरूआती दौर में ही अंग्रेजों की नजर भारत पर पड़ी और उसने इसके साथ व्यापार करने के रास्ते खोजने शुरू किये जिसके चलते मुगल सम्राट जहांगीर के शासनकाल में इन्होंने भारत में व्यापार करने का शाही फरमान जारी कराया। इस बात का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि उस समय भारत का विश्व व्यापार में क्या हिस्सा रहा होगा, क्योंकि 1756 में जब अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल के नवाब सिरोजुदौला को पलाशी युद्ध में छल-बल से हराया तो विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 24 प्रतिशत के लगभग था। उस समय तक मुगलिया सल्तनत ढह चुकी थी और पूरे भारत में देशी राजे-रजवाड़ाें की स्वायत्तता सिर चढ़ कर बोल रही थी, परन्तु इसके बाद जब औद्योगिक क्रान्ति का दौर शुरू हुआ तो साम्राज्यवादी यूरोपीय ताकतों ने दुनिया के प्राकृतिक आय स्रोतों से सम्पन्न व समुद्री मार्ग से व्यापार के लिए जरूरी बने देशों को कब्जाना शुरू किया जिससे वे अपने देश में बने माल की समुचित खपत कर सकें और इन देशों में उपलब्ध खनिज सम्पदा का अधिकाधिक दोहन अपने लाभ में कर सकें। इस क्रम में भारत की भौगोलिक स्थिति अंग्रेजों के लिए आदर्श साबित हुई, जहां से बैठ कर उन्होंने पूरे पश्चिम एशिया का शासन संचालित किया। इसके लिए सबसे पहले तुर्की के उस्मानिया साम्राज्य का ढहना जरूरी था जिसे उन्होंने 1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध के दौरान किया। तब तक भारत पर अंग्रेजों का पुख्ता राज कायम हो चुका था और अमेरिका भी अपनी ताकत के बूते पर विश्व व्यवस्था में अपनी जगह बना चुका था। इस युद्ध के बाद ब्रिटेन ने अपनी सुविधा के अनुसार एशिया व अफ्रीकी देशों का भौगोलिक निर्धारण किया खास कर पश्चिम एशियाई देशों का क्योंकि तब तक इन देशों में इनकी धऱती के गर्भ में छिपे खनिज तेल की खोज होने लगी थी, परन्तु विश्व क्रम के इस बदलाव के बाद जर्मनी में भी औद्योगिक क्रान्ति के चलते अपना वर्चस्व पूरी दुनिया में स्थापित करने की इच्छा जागृत हुई और इसके तानाशाह बने नेता हिटलर ने विश्व विजेता बनने की ठान ली, परन्तु इसके समानान्तर रूस में एेसा बदलाव हो रहा था जिसमें दुनिया के औपनिवेशिक देशों में अपने बूते पर शासक वर्ग के खिलाफ विद्रोह करने की भावना को बल मिल रहा था। अतः हिटलर ने 1938 के आते-आते पहला समझौता रूस के साथ ही किया और अन्य करीब के यूरोपीय देशों के विरुद्ध सैन्य अभियान शुरू कर दिया, परन्तु हिटलर की बढ़ती ताकत से खुद रूस ही घबरा बैठा और उसने इस युद्धकाल में यूरोपीय देशों के पाले में जाना बेहतर समझा। इस युद्ध को ही द्वितीय विश्व युद्ध कहा गया जिसमें रूस समेत सभी यूरोपीय ताकतों ने जर्मनी का विरोध किया केवल जापान व इटली जैसे देशों ने हिटलर का साथ दिया जिनकी 1945 के आते- आते भारी पराजय हुई और जर्मनी भी दो भागों में बंट गया, परन्तु इस युद्ध के चलते ब्रिटेन समेत अन्य साम्राज्यवादी यूरोपीय देशों की ताकत खत्म सी हो गई और इसके समानान्तर अमेरिका की आर्थिक ताकत सब के सिर चढ़ कर बोलने लगी। हालत यहां तक आ गई कि ब्रिटेन के पास अपनी विशाल फौज की तनख्वाहें देने तक के पैसे नहीं बचे और अमेरिका की मदद से उसे यह काम करने को मजबूर होना पड़ा जिससे अमेिरका ने दबाव बनाना शुरू किया ब्रिटेन अपने उपनिवेशों को खाली करें जिससे इन देशों में बढ़ते सोवियत या रूसी प्रभाव को थामा जा सके। एेसे देशों में भारत सबसे प्रमुख राष्ट्र था अतः 1947 में इसे स्वतन्त्र घोषित कर दिया गया परन्तु इसे धार्मिक आधार पर दो देशों में बांट दिया गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि पाकिस्तान को यूरोपीय देश भविष्य में अपना ‘सेवादेश’ बनाकर रखना चाहते थे जिससे इसके कराची शहर से लगे अरब महासागर की मार्फत आस्ट्रेलिया तक फैले प्रशान्त महासागर तक के क्षेत्र में अपना दबदबा कामय रख सकें। आस्ट्रेलिया देश पर अंग्रेजों का ही प्रभुत्व था, अतः हिन्द महासागर को छूते प्रशान्त महासागर की इस जल भौगोलिकी को समझना बहुत जरूरी है जिसके चलते यूरोपीय ताकतों ने कैरिबियाई जल क्षेत्र के देशों तक में अपने उपनिवेश स्थापित किये हुए थे, परन्तु 1947 में भारत को स्वतन्त्र किये जाने के बाद इन क्षेत्रों के सभी औपनिवेशिक राष्ट्रों में आजादी की नई चेतना ने उभार लेना शुरू किया और देखते–देखते ही ये देश ब्रिटेन, फ्रान्स, नीदरलैंड व पुर्तगाल के शिकन्जे से आजादी प्राप्त करने लगे। सेशेल्स भी एेसा ही एक देश है जो हिन्द महासागर के परिक्षेत्र में पड़ता है।
प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी इसी देश की तीन दिन की राजकीय यात्रा पर आजकल यहां गये हुए हैं। अतः श्री मोदी का द्विपक्षीय वार्ता के बाद यह कहना कि भारत हिन्द महासागर परिक्षेत्र को अवसरों का महासमुद्र बनाना चाहता है। पूरे महासागरीय मूलक देशों की अर्थव्यवस्था को नया आयाम देने वाला है। सेशेल्स के राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी ने श्री मोदी को अपने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान गार्जियन आफ द ब्लू होराइजन से भी सम्मानित किया। श्री मोदी ने हिन्द महासागर क्षेत्र को समुद्री अपराधों से मुक्त रखने के लिए आपसी सहयोग बढ़ाने व संयुक्त रणनीति बनाने पर भी जोर दिया। भारत सत्तर के दशक तक हिन्द महासागर क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय शान्ति क्षेत्र घोषित करने के पक्ष में रहा था। श्री मोदी अब बदली परिस्थितियों में इस क्षेत्र के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को आपसी निर्भरता के आधार पर विकास के पथ पर डालना चाहते हैं जिसके लिए स्पष्ट दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता है। हिन्द महासागर क्षेत्र की एक विशिष्ट शक्ति होने की वजह से भारत की नीति इसी लक्ष्य को प्राप्त करने की तरफ आगे बढ़ती प्रतीत हो रही है।























