विश्व युद्ध का खतरा

इजराइल और अमेरिका द्वारा मिल कर ईरान के विरुद्ध छेड़े गये युद्ध से अब पूरी दुनिया में भारी अफरा-तफरी की आशंका पैदा होती जा रही है और एेसा लग रहा है कि विश्व के विभिन्न देशों की सबसे बड़ी पंचायत ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ एक मूकदर्शक बन चुकी है। जिस प्रकार इजराइली-अमेरिकी हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद अली खामेनेई की हत्या की गई है उसे किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह ईरान के लोगों द्वारा अपने लिए चुनी गई शासन व्यवस्था पर विदेशी आक्रमण है। श्री खामेनेई की हत्या के बाद ईरान के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है और वे सड़कों पर निकल कर अमेरिका से बदला लेने की मांग कर रहे हैं। भारत शुरू से ही यह मानता रहा है कि किसी भी देश में किस प्रकार की शासन व्यवस्था काबिज हो, इसका फैसला सिर्फ उस देश की जनता को ही करने का अधिकार होता है। अतः ईरान में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस तरह सत्ता परिवर्तन को इस युद्ध का ध्येय बता रहे हैं उसका कोई औचित्य नहीं है लेकिन ईरान में अमेरिकी कार्रवाई के बाद पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों से प्रतिक्रिया प्राप्त हो रही है वह इस पूरे क्षेत्र की स्थिरता और सौहार्दता के माहौल के लिए खतरा पैदा करती है। श्री खामेनेई पूरी दुनिया के शिया मुस्लिम सम्प्रदाय के लोगों के नेता भी माने जाते थे अतः उनकी हत्या के बाद कई मुस्लिम देशों में लोग सड़कों पर उतर कर विरोध-प्रदर्शन भी कर रहे हैं। इसका प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप के देशों तक पर पड़ा है, मगर असली सवाल यह है कि क्या यह युद्ध जल्दी ही समाप्त हो जायेगा अथवा लम्बे समय तक खिंचेगा? इस सन्दर्भ में हमें इस तथ्य पर गौर करना होगा कि ईरान की सैन्य क्षमता कितनी है और उसके समर्थन में कौन-कौन सी विश्व शक्तियां खड़ी हुई हैं? इस मामले में रूस व चीन का नाम लिया जा सकता है क्योंकि ये दोनों देश ही आर्थिक व सैनिक रूप से ईरान के सहयोगी रहे हैं परन्तु इसके साथ यह भी देखना होगा कि इन दोनों देशों के पश्चिम एशिया में अपने-अपने हित किस प्रकार सधते हैं। इस क्षेत्र के अधिकतम मुस्लिम देशों के शासक अमेरिका परस्त माने जाते हैं जिसकी वजह से इस क्षेत्र के पूरे समुद्री इलाके में अमेरिकी जंगी जहाजी बेड़ों का पूरा काफिला तैनात रहता है तथा जमीन पर इनमें से अधिसंख्य में अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं। अतः ईरान ने पलटवार करते हुए सबसे पहले इन्हीं सैनिक अड्डों को अपना निशाना बनाया है। उसने अभी तक बहरीन, कतर , संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब व जोर्डन स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डों पर हमले करके उन्हें तहस-नहस करने का प्रयास इसीलिए किया है जिससे उसके इजराइल पर किये जाने वाले हमलों में किसी प्रकार का अवरोध पैदा न हो। इससे लगता है कि ईरान को अमेरिका की मंशा पर पहले से ही अन्देशा था और वह जानता था कि अमेरिका उसे बातचीत में उलझा कर अचानक हमला बोल सकता है। उसकी यह रणनीति पिछले वर्ष इजराइल से चली 12 रोजा जंग के बिल्कुल विपरीत है।
पिछले वर्ष ईरान ने इजराइल पर जो मिजाइल हमले किये थे उन्हें बीच में ही इन अड्डों से प्रतिरोधी अस्त्र चला कर बड़ी हद तक नाकामयाब कर दिया जाता था। ईरान की सबसे बड़ी सैन्य ताकत उसका अत्याधुनिक मिजाइल जखीरा है जो उसे रूस व चीन के सहयोग से प्राप्त हुआ है। उसके पास ड्रोन आक्रमण की क्षमता भी अद्भुत है मगर इनके भरोसे वह अमेरिका जैसी महाशक्ति से पार नहीं पा सकता है, अतः संभावना यह व्यक्त की जा रही है कि उसकी मदद के लिए कहीं रूस व चीन न कूद पड़ें। यदि एेसा होता है तो इस युद्ध के विश्व युद्ध में बदलने की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पिछले कई वर्षों से उसके खिलाफ मुहीम छेड़े हुए हैं और वह नहीं चाहता कि ईरान किसी भी सूरत में परमाणु बम बनाये। इसके चलते पिछले लगभग डेढ़ दशक से अमेरिका ने ईरान पर विविध आर्थिक प्रतिबन्ध भी लगाये हुए हैं। दूसरी तरफ ईरान का कहना रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शान्तिपूर्ण विकास के लिए ही है जिसे करने का उसे पूरा हक है। इसी मुद्दे पर अमेरिका व ईरान के बीच पिछले दिनों से वार्तालाप भी चल रही थी जिसकी मध्यस्थता ओमान कर रहा था। इस सन्दर्भ में ईरान इस बात के लिए भी राजी हुआ कि उसके परमाणु कार्यक्रम का निरीक्षण अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी भी करे मगर उसे यूरेनियम परिशोधन करने से नहीं रोका जा सकता। यह भी पूरी दुनिया जानती है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम रूस के सहयोग से ही कर रहा था लेकिन अमेरिका ने ओमान की मध्यस्थता में चल रही शान्ति वार्ता के दौरान ही इजराइल के साथ मिलकर हमला कर दिया और इसके सर्वोच्च नेता खामेनेई के साथ ही इसके रक्षामन्त्री व फौजी कमांडर को भी निशाना बना डाला।
जाहिर है कि यह स्थिति किसी भी स्वयंभू राष्ट्र की अस्मिता के लिए चुनौती के समान ही होगी अतः ईरान अब जवाबी हमलों पर अपनी ताकत झोंक रहा है। जहां तक भारत का सवाल है तो इसकी नीति आजादी के बाद से ही युद्ध विरोधी रही है और यह हर समस्या का हल केवल बातचीत के द्वारा निपटाने का ही हिमायती रहा है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रम्प का मानना है कि उन्हें ईरान में सत्ता बदलने का भी अधिकार है। जहां तक इजराइल का सवाल है तो 1992 के बाद से इस देश के साथ भारत के सम्बन्ध बहुत सुधरे हैं और यह इजराइली आयुध सामग्री का बहुत बड़ा खरीदार होने के साथ इसका रणनीतिक मित्र भी है परन्तु भारत फिलिस्तीन के पक्ष में भी प्रारम्भ से ही खड़ा रहा है और मानता है कि अरब की फिलिस्तनी धरती पर इजराइल व फिलिस्तीन दोनों देशों का अस्तित्व बना रहना चाहिए। अतः विदेश मन्त्री एस. जयशंकर ने कल दोनों ही देशों के विदेश मन्त्रियों से फोन पर बातचीत करके कहा कि मामले को बातचीत की मेज पर बैठकर ही सुलझाया जाना चाहिए लेकिन ईरान के साथ भारत के विशिष्ट एेतिहासिक व सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं जिन्हें नजरन्दाज नहीं किया जा सकता।

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