पश्चिम एशिया में चल रहा ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध अब ऐसे मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा था जिसमें दोनों पक्ष एक-दूसरे को नेस्तानाबूद करने की आवाजें लगा रहे थे मगर इसी बीच आज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा कर दी है कि वह अगले दो या तीन सप्ताहों तक इस युद्ध से बाहर आ जायेंगे, चाहे ईरान से समझौता हो या न हो। इससे लगता है कि ट्रम्प इस युद्ध में लगातार अकेले पड़ते जा रहे थे जिसकी वजह से अमेरिका में भी उनका भारी नागरिक विरोध होना शुरू हो गया है। ट्रम्प इससे पूर्व कह चुके थे कि ईरान अपने होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री रास्ते के बारे में क्या रुख अपनाता है।
यह देखना अब इस रास्ते के बन्द होने से प्रभावित देशों का काम है। इससे पूर्व ईरान व इजराइल एक-दूसरे के सामरिक व महत्वपूर्ण नागरिक संस्थानों को अपने निशाने पर ले रहे हैं। एक ओर जहां अमेरिका ने ईरान के इस्फहान शहर में स्थित उसके परमाणु संयन्त्र पर हमला किया तो दूसरी ओर ईरान ने इजराइल व अमेरिकी मित्र पश्चिम एशियाई देशों के तेल टैंकरों व तेल संस्थानों पर हमले शुरू कर दिये। मगर इसके साथ ही डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि यह युद्ध अब केवल दो से तीन सप्ताह ही और चलेगा और इस दौरान वह ईरान को घुटनों पर ले आयेंगे। जबकि ईरान का कहना था कि वह युद्ध विराम केवल इसी शर्त पर करेगा जब उसे यह आश्वासन दिया जायेगा कि भविष्य में उस पर कभी दुबारा हमला नहीं किया जायेगा।
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि यह युद्ध विगत 28 फरवरी को इजराइल व अमेरिका ने ही शुरू किया था जिसका प्राथमिक लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना बताया गया था। मगर ट्रम्प ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को आक्रमण के जरिये मौत के घाट उतारने के बावजूद यह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके और उन्होंने युद्ध को आगे खींचते हुए इसका लक्ष्य ईरान को परमाणु शक्ति से विहीन करने का निर्धारित कर दिया परन्तु इस समर को चलते एक महीने से ज्यादा का वक्त बीतने पर इसकी जद में पश्चिम एशिया के लगभग सभी अमेरिकी मित्र खाड़ी देश भी आ गये।
इन देशों की सम्पत्ति का आधार इनमें पाये जाने वाले पेट्रोलियम पदार्थ व प्राकृतिक गैस के स्रोत हैं और ईरान ने अपने नियन्त्रण के होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री रास्ते को बन्द करके इनके परिवहन को बन्द जैसा कर दिया जिससे दुनिया के विभिन्न देशों में ऊर्जा संकट की स्थिति पैदा हो गई। अमेरिका इस होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को खोलने को एक वैश्विक मुद्दा बनाना चाहता था और विश्व के विभिन्न प्रभावित देशों को इस युद्ध में अपनी ओर करना चाहता था परन्तु इस मुद्दे पर उसे मुंह की खानी पड़ी और कई महत्वपूर्ण पश्चिमी यूरोपीय देशों ने उसके पक्ष में खड़े होने से मना कर दिया। हालांकि सभी चाहते हैं कि जलडमरूमध्य का मार्ग खुलना चाहिए लेकिन उन्होंने युद्ध में ट्रम्प का सहयोगी बनने से साफ इन्कार कर दिया।
इनमें स्पेन से लेकर ब्रिटेन, जर्मनी, इटली व फ्रांस तक शामिल हैं। इसके साथ ही पश्चिमी यूरोपीय देशों के सामरिक संगठन नाटो ने भी अमेरिका का साथ देने से इन्कार कर दिया था और कहा था कि यह अमेरिका की अपनी लड़ाई है। इससे जाहिर था कि ट्रम्प इस मामले में धीरे-धीरे अकेले पड़ते नजर आ रहे थे जिसकी वजह से वह अब युद्ध को समाप्त करने की तजवीजें ढूंढने के लिए उतावले हुए। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इस युद्ध के बारे में अमेरिका के रक्षामन्त्री पीट हेगसेथ कह रहे थे कि अगले कुछ दिन युद्ध के लिए बहुत निर्णायक साबित होंगे। उनका कहना था कि अगर अगले कुछ दिनों में ईरान अमेरिका से समझौते के लिए राजी नहीं हुआ तो उसके खिलाफ भीषण हमला किया जायेगा।
इसके साथ ही ट्रम्प यह भी कह रहे थे कि यदि ईरान समझौता नहीं करता है तो उसके सभी बिजली व तेल ऊर्जा संयन्त्रों को नष्ट कर दिया जायेगा तथा उसके उस खार्ग द्वीप पर हमला करके कब्जा कर लिया जायेगा जहां से वह अपने कच्चे तेल का 90 प्रतिशत से अधिक निर्यात अन्य देशों को करता है। साथ ही ट्रम्प इस संभावना से भी इन्कार नहीं कर रहे थे कि ईरान की धरती पर अमेरिकी सैनिकों को भी उतारा जा सकता है। इसके लिए अमेरिका पश्चिम एशिया के इलाके में अपने दस हजार अतिरिक्त पैदल सैनिकों के अलावा कई नौसैनिक जहाजों को भी रवाना कर चुका था। इसका मतलब यह निकाला गया कि ट्रम्प ईरान में यह डर पैदा कर देना चाहते हैं कि अगर उसने उनकी शर्तें न मानी तो वह पूरे ईरान को बर्बाद कर देंगे।
मगर ईरान ईंट का जवाब पत्थर से दे रहा है और जवाब में इजराइल पर बेतहाशा हमले कर रहा है और अमेरिका के मित्र पश्चिम एशियाई देशों में उसके संस्थानों को भी अपने निशाने पर रख रहा है। इनमें कई खाड़ी देशों के तेल उत्पादक संयन्त्र भी शामिल है। अभी कल ही उसने संयुक्त अरब अमीरात के एक तेल टैंकर पर हमला किया। ईरान अब कह रहा है कि वह खाड़ी देशों में अमेरिकी कम्पनियों पर भी जवाबी हमले करेगा। दरअसल ट्रम्प कह चुके थे कि उन्हें ईरान की तेल सम्पदा पसन्द है। उनका यह कथन बताता था कि इस महायुद्ध का सबब क्या है ? क्योंकि पिछले दिनों उन्होंने जिस तरह वेनेजुएला देश पर कब्जा करके उसकी तेल सम्पदा को कब्जाया था उससे उनके इरादे साफ हो जाने चाहिए थे।
यही वजह है कि पश्चिम एशिया के इस युद्ध में यूरोपीय देशों ने अमेरिका का साथ देने से इन्कार किया और कुछ ने तो इसे असंवैधानिक युद्ध भी बताया। दरअसल ट्रम्प मूल रूप से एक व्यापारी या व्यवसायी हैं और जब किसी देश का नेतृत्व किसी व्यापारी के हाथ में पहुंच जाता है तो वह आम जनता के हितों से बेखबर हो जाता है। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि ऐसा भारत के महान राजनीतिक दार्शनिक आचार्य चाणक्य ने अपनी कालजयी पुस्तक अर्थशास्त्र में लिखा है। अतः हमने देखा कि ईरान-इजराइल युद्ध में सभी मानद नैतिकताएं टूटीं और सामान्य नागरिक इसका शिकार बने। इसका असली कारण यही है कि ट्रम्प की व्यापारी नजर दुनिया के विभिन्न आय स्रोतों को केवल मुनाफा कमाने की गरज से आंक रही है लेकिन उनके इस नजरिये का अब अमेरिका के नागरिकों में भी भारी विरोध होना शुरू हो गया जिसकी वजह से वह इस युद्ध से जल्दी से जल्दी छुटकारा पाना चाहते हैं।























