Modi Cabinet Expansion: NDA के नए सहयोगियों को मिलेगा मंत्री पद या पुराने सहयोगियों का बढ़ेगा दबदबा? कैबिनेट विस्तार पर बढ़ी सियासी हलचल

Modi Cabinet Expansion: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हाल के दिनों में एनडीए (NDA) का समर्थन करने वाले नए सांसदों को मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी या फिर पुराने सहयोगी दलों का ही प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाएगा। आम आदमी पार्टी (AAP), तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) से अलग होकर एनडीए के साथ आए सांसदों की भूमिका अब चर्चा का प्रमुख विषय बन गई है।

कैबिनेट विस्तार में किसे मिलेगी प्राथमिकता?

भारतीय संविधान के अनुसार मंत्रिमंडल का गठन और विस्तार प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि संभावित कैबिनेट विस्तार में वर्षों से एनडीए के साथ जुड़े सहयोगी दलों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा या हाल ही में समर्थन देने वाले नए सांसदों को मंत्री बनने का अवसर मिलेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन और आगामी चुनावी रणनीति को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।

TMC के 20 बागी सांसदों पर टिकी नजर

कैबिनेट विस्तार को लेकर सबसे अधिक चर्चा तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए 20 सांसदों को लेकर है। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर बताया कि वे एनसीपीआई (NCPI) नामक नए दल से जुड़ चुके हैं और देश के विकास के लिए एनडीए सरकार को समर्थन दे रहे हैं।

यदि इन सांसदों की संवैधानिक स्थिति को मान्यता मिलती है, तो संख्या के लिहाज से यह समूह एनडीए के बड़े सहयोगियों में शामिल हो सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस नए समूह को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिलेगा?

कौन होगा TMC के बागी सांसदों का चेहरा?

टीएमसी से अलग हुए सांसदों में काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय, शताब्दी रॉय, माला रॉय, यूसुफ पठान और अरूप चक्रवर्ती जैसे कई प्रमुख नाम शामिल हैं। हालांकि सभी सांसद एनडीए को समर्थन दे चुके हैं, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस समूह का सबसे प्रभावशाली नेता कौन होगा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि नेतृत्व को लेकर स्पष्टता नहीं बनती, तो मंत्री पद के चयन में भी कठिनाई आ सकती है।

AAP से आए सांसदों की दावेदारी भी चर्चा में

आम आदमी पार्टी से अलग होकर एनडीए का समर्थन करने वाले सात सांसदों को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। इनमें राघव चड्ढा का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, लेकिन यह तय नहीं माना जा रहा कि वही पूरे समूह का नेतृत्व करेंगे।

इस बीच स्वाति मालीवाल पहले ही अलग राजनीतिक रुख अपना चुकी हैं। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि यदि इस समूह को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिलता है, तो उसका चेहरा कौन होगा।

क्या शिंदे गुट का बढ़ेगा मंत्री कोटा?

शिवसेना (UBT) में टूट के बाद छह और सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के साथ आ चुके हैं। इसके बाद लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है।

यह संख्या अब कई सहयोगी दलों से अधिक मानी जा रही है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में शिवसेना का मंत्री कोटा बढ़ाया जाएगा।

यदि ऐसा होता है, तो यह भी देखना होगा कि मंत्री पद पुराने सांसदों को मिलेगा या हाल ही में शामिल हुए नए सांसदों को।

JDU और TDP भी बढ़ा सकते हैं अपनी दावेदारी

वर्तमान में एनडीए सरकार में प्रमुख सहयोगी दलों की हिस्सेदारी पर नजर डालें तो जेडीयू के पास दो मंत्री (एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री), तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के पास दो मंत्री और शिवसेना के पास एक मंत्री पद है।

ऐसे में यदि मंत्रिमंडल का विस्तार होता है, तो जेडीयू और टीडीपी भी अपने मंत्री पदों की संख्या बढ़ाने की मांग कर सकते हैं। वहीं अजित पवार के नेतृत्व वाली पार्टी से भी नए चेहरे को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं।

सरकार के सामने राजनीतिक संतुलन की चुनौती

संभावित कैबिनेट विस्तार में केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की होगी। एक ओर वर्षों से एनडीए के साथ जुड़े सहयोगी दल अधिक प्रतिनिधित्व की उम्मीद कर रहे हैं, तो दूसरी ओर हाल ही में समर्थन देने वाले सांसद भी अपनी राजनीतिक भागीदारी चाहते हैं।

ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसा संतुलित फैसला लेना होगा, जिससे गठबंधन के पुराने सहयोगियों की नाराजगी भी न बढ़े और नए समर्थकों को भी उचित राजनीतिक संदेश मिल सके।

क्या होगा अंतिम फैसला?

फिलहाल मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है कि संभावित विस्तार में सहयोगी दलों और नए समर्थक सांसदों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की जाएगी। अब सभी की नजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगले फैसले पर टिकी है, जो एनडीए की भविष्य की राजनीतिक रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

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