दिशा विहीन होता युद्ध !

दिशा विहीन

पश्चिम एशिया में चल रहा ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध अब ऐसी दिशा विहीनता की तरफ जाता दिखाई पड़ रहा है जिसमें पूरी दुनिया के विभिन्न देश असमंजस की स्थिति में जान पड़ते हैं क्योंकि एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कह रहे हैं कि अब ईरान में सैनिक गतिविधियां कम करने का समय आ गया है और दूसरी तरफ वह अरब सागर क्षेत्र में भारी नौसैनिक आयुध बेड़ा भी भेज रहे हैं और साथ ही ईरान के परमाणु संयन्त्र क्षेत्र नतांज पर हमला भी कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह धमकी भी दे दी है कि अगर 48 घंटे के भीतर ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य का समुद्री मार्ग यातायात के लिए न खोला तो ईरान पर भयंकर निर्णायक हमला होगा।

इससे जाहिर है कि ट्रम्प भारी मानसिक दबाव में हैं और वह हर पल अपनी रणनीति बदल रहे हैं। इसके समानान्तर ईरान अपनी सीमाओं से लगभग चार हजार कि.मी. दूर समुद्री सीमाओं में हिन्द महासागर क्षेत्र में स्थित ‘दियेगो गार्शिया’ टापू पर बने अमेरिकी-ब्रिटिश सैनिक अड्डे पर प्रक्षेपास्त्र हमले करके चौंका रहा है और ऐलान कर रहा है कि वह अपने ऊपर किये गये इजराइली-अमेरिकी हमले का जवाब पूरी सैनिक क्षमता व सामर्थ्य के साथ देगा परन्तु इस बीच ट्रम्प दुनिया के उन तमाम देशों से यह आह्वान भी कर रहे हैं कि वे ईरान के कब्जे वाले होर्मुज जलडमरूमध्य के समुद्री मार्ग को खोलने के लिए एकजुट हो जायें जिससे उनके यहां पेट्रोलियम, कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस की सप्लाई बाधित न हो सके।

बेशक यूरोप के विभिन्न देशों ने जलडमरू मार्ग को वाणिज्यिक यातायात के लिए खोलने के लिए ईरान से अपील की है मगर फ्रांस व जर्मनी ने कहा है कि पहले युद्ध की समाप्ति की घोषणा होनी चाहिए। ये सब तथ्य बताते हैं कि ट्रम्प की पहल पर शुरू हुए इस युद्ध का अब कोई छोर नजर नहीं आ रहा है। ट्रम्प इसके साथ यह भी कह रहे हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर अमेरिका के लिए कोई जहाज नहीं आता है इसलिए प्रभावित देशों का ही दायित्व बनता है कि वे इसे खुलवाने के लिए स्वयं आगे आयें।

इसका मतलब यही निकलता है कि अमेरिका अब इस युद्ध की जिम्मेदारी से खुद को अलग करने की फिराक में भी लगता है मगर यह इतना आसान नहीं है क्योंकि युद्ध ने जिस तरह पूरे ईरान में तबाही मचाई है उसकी भरपाई करने के लिए ईरान किसी भी हद तक जा सकता है जिसका प्रमाण दियेगो गार्शिया पर किया गया ताजा हमला है। जहां तक भारत का सम्बन्ध है तो वह इस हमले के बाद युद्ध की विभीषिका के प्रबल होने की आशंका को समाप्त करने के पक्ष में ही खड़ा होगा क्योंकि युद्ध यदि अन्तर्क्षेत्रीय व अन्तर्महाद्विपीय मिसाइलों या प्रक्षेपास्त्रों के प्रयोग के मुहाने पर आकर खड़ा होता है तो इससे हिन्द महासागर क्षेत्र के भी जंगी अखाड़ा बन जाने की संभावना प्रबल हो जायेगी।

यही वजह है कि भारत ऐतिहासिक रूप से दियेगो गार्शिया को किसी भी देश के सैनिक अड्डे के रूप में विकसित करने के खिलाफ रहा था। 1966 में जब ब्रिटेन ने मारीशस को स्वतन्त्रता प्रदान की थी तो इसके विभिन्न टापुओं में से दियेगो गार्शिया पर अपना कब्जा बरकरार रखा था और इसे 50 वर्ष के लिए अमेरिका को पट्टे पर दे दिया था। जब दियेगो गार्शिया को पट्टे पर दिया गया तो भारत में कांग्रेस की श्रीमती इन्दिरा गांधी की सरकार थी और उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से स्पष्ट कर दिया था कि अमेरिका को दियेगो गार्शिया में सैनिक अड्डा बनाने की छूट मिलने से पूरे एशियाई-प्रशान्त क्षेत्र की शान्ति पर दुष्प्रभाव पड़ेगा।

अतः विश्व पंचायत संयुक्त राष्ट्र संघ को हिन्द महासागर क्षेत्र को ‘अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति क्षेत्र’ घोषित करना चाहिए। उस समय भारत का यह रुख बहुत दूरदृष्टिता पूर्ण था क्योंकि तब भारत के पड़ोसी देश चीन की सैनिक महत्वाकांक्षाओं का वह अन्दाजा लगा रहा था लेकिन बाद में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में आये बदलावों की वजह से हिन्द महासागर क्षेत्र को शान्ति क्षेत्र घोषित नहीं किया जा सका और अमेरिका ने यहा अपना सैनिक अड्डा स्थापित कर लिया लेकिन 1979 में जब ईरान में ही इस्लामी क्रान्ति आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुई और यहां शाही शासन समाप्त हुआ तो उसके बाद से अमेरिका ने दियेगो गार्शिया का भरपूर इस्तेमाल करने में कोई कोताही नहीं बरती और 1990-91 के पश्चिम एशिया में हुए खाड़ी युद्ध के दौरान इसी अड्डे से मिसाइलों व लड़ाकू हवाई जहाजों से हमले किये गये। 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान को अपना निशाना बनाया तो तब भी इसी अड्डे का सैनिक इस्तेमाल किया गया।

इसके बाद 2003 में भी जब अमेरिकी सेनाओं ने इराक पर हमला किया तो दियेगो गार्शिया से ही भारी हवाई हमले किये गये थे। अतः ईरान ने इसे सीधे निशाने पर लेकर चेतावनी दे दी है कि उसे युद्ध के व्यापक होने का भी कोई डर नहीं है परन्तु दियेगो गार्शिया मूल रूप से मारीशस का ही भाग कहा जा सकता है क्योंकि 2019 में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने फैसला दिया था कि 1966 में ब्रिटेन द्वारा इसे अलग रखना असंवैधानिक था परन्तु ब्रिटेन द्वारा 1966 में अमेरिका को 50 साल के पट्टे पर दिये जाने के बाद 2016 में इस पट्टे की अवधि 20 साल के लिए और बढ़ा दी जो 2036 में समाप्त होगी। इसके बाद 2025 में ब्रिटेन ने मारीशस के साथ संप्रभुता समझौता किया जिसमें इसके करीब के सभी क्षेत्रीय टापुओं की संप्रभुता मारीशस को सौंप दी गई परन्तु ब्रिटेन ने इसके साथ ही दियेगो गार्शिया टापू क्षेत्र को 99 वर्ष के पट्टे पर लिये जाने का अनुबन्ध भी कर लिया जो कि प्रतिवर्ष लगभग दस करोड़ पौंड के शुल्क के साथ था।

इससे कम से कम हम यह तो अन्दाजा लगा ही सकते हैं कि अमेरिका व ब्रिटेन के आपसी हित सैनिक रूप से किस प्रकार नत्थी हैं अतः सबसे जरूरी यह है कि इस दिशा विहीन होते पश्चिम एशिया युद्ध को रुकवाने के सभी शान्ति प्रिय देश संयुक्त प्रयास करें। इस मामले में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कल ईरान के राष्ट्रपति श्री पेजेशकियान से फोन पर की गई वार्ता का विशेष महत्व है। श्री मोदी ने दो दिन पहले ही फ्रांस के राष्ट्रपति श्री मैक्राें से भी बात की थी और मैक्राें का कहना है कि पहले युद्ध समाप्त होना चाहिए।

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