जंक फूड ने पैदा कर दी सेहत की चिंता

जंक फूड

वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आर्थिक सर्वेक्षण 2025-2026 में चेतावनी दी गई है कि 2035 तक भारत में 8.3 करोड़ तक बच्चे मोटापे का शिकार हो सकते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट से पहले संसद में यह सर्वेक्षण पेश किया। इस दस्तावेज़ में अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति का आधिकारिक आकलन और भविष्य की संभावनाओं का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। आर्थिक सर्वेक्षण ने एक गंभीर चेतावनी दी है, जो खाना आज हम अपने बच्चों को खिला रहे हैं, वही कल करोड़ों बच्चों की सेहत और देश की आर्थिक मजबूती के लिए खतरा बन सकता है। पहली बार मोटापे और अनहेल्दी डाइट को सिर्फ हेल्थ इश्यू नहीं, बल्कि आर्थिक जोखिम के रूप में देखा गया है।

यह चेतावनी हमें रुक कर सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारे बच्चे क्या खा रहे हैं और क्यों। वास्तव में, देश में आज बच्चों की थाली सिर्फ घर का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के भविष्य और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ गई है। तेज रफ्तार से भागती जिंदगी, काम का दबाव और आसान विकल्पों की तलाश ने माता-पिता को पैकेट बंद और रेडी-टू-ईट खाने की ओर मोड़ दिया है। चिप्स, बिस्किट, शुगरी ड्रिंक्स, इंस्टेंट नूडल्स और फास्ट फूड अब बच्चों की रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

इन्हें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड यानी यूपीएफ कहा जाता है, ऐसे फूड्स जिनमें ज्यादा शुगर, नमक, अनहेल्दी फैट और केमिकल एडिटिव्स होते हैं, लेकिन पोषण बहुत कम होता है। यूपीएफ का अत्यधिक सेवन सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है और मधुमेह (डायबिटीज), हृदय रोग और हाइपरटेंशन जैसे गैर-संक्रामक रोगों (एनसीडी) का खतरा बढ़ रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि भारत में 24 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष ओवरवेट या मोटापे का शिकार हैं। बच्चों में स्थिति और भी चिंताजनक है।

पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ओवरवेट होने की दर 2015-16 में 2.1 प्रतिशत थी, जो 2019-21 में बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गई। संख्या में देखें तो 2020 में करीब 3.3 करोड़ बच्चे मोटे थे और अनुमान है कि 2035 तक यह आंकड़ा 8.3 करोड़ तक पहुंच सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण में आहार संबंधी सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता बताई गई है। भारत यूपीएफ की बिक्री के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। सर्वेक्षण बताता है कि भारत में यूपीएफ का बाजार तेजी से बढ़ा है। साल 2006 में जहां इसकी रिटेल बिक्री लगभग 0.9 बिलियन डॉलर थी, वहीं 2019 तक यह बढ़कर करीब 38 बिलियन डॉलर हो गई।

यह बढ़ोतरी सिर्फ़ बाजार का आंकड़ा नहीं है, बल्कि बदलती खान-पान की आदतों का सबूत है। ज्यादा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स खाने को मोटापा, डायबिटीज, दिल की बीमारियों, सांस की समस्याओं और मेंटल डिसऑर्डर्स से जोड़ा गया है। आर्थिक सर्वेक्षण साफ कहता है कि इसका असर सिर्फ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा। इससे घरों और सरकार दोनों के लिए हेल्थ केयर खर्च बढ़ेगा। लंबी बीमारियों के कारण काम करने की क्षमता घटेगी। प्रोडक्टिविटी कम होगी और पब्लिक फाइनेंस पर दबाव बढ़ेगा। इसलिए मोटापे को मानव पूंजी के लिए खतरा बताया गया है।

इस समस्या से निपटने के लिए, सर्वेक्षण में विद्यालय स्तर पर हस्तक्षेप की सिफारिश की गई, जिसमें पीने के पानी की उपलब्धता में सुधार, मुफ्त फल उपलब्ध कराना, कैंटीन में केवल स्वास्थ्यवर्धक विकल्प सुनिश्चित करना और वेंडिंग मशीनों को हटाना शामिल है। रिपोर्ट में स्कूल कर्मचारियों के नेतृत्व में एक स्वास्थ्य परिषद के गठन और स्कूल-आधारित उपायों को मजबूत करने के लिए एक लिखित स्वास्थ्य नीति लागू करने का सुझाव भी दिया गया। इसके अतिरिक्त, इसमें अभिभावकों और कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और कार्यशालाओं के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के साथ अधिक सहयोग की सिफारिश की गई।

मोटापे को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में पहचानते हुए, सरकार ने कई पहल शुरू की हैं ताकि स्वास्थ्य, पोषण, शारीरिक गतिविधि, खाद्य सुरक्षा और जीवनशैली में सुधार को एकीकृत करते हुए समग्र दृष्टिकोण अपनाया जा सके। पोषण अभियान एवं पोषण 2.0, फिट इंडिया मूवमेंट, खेलो इंडिया, ईट राइट इंडिया, राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान – आज से थोड़ा कम जैसे कदम इन पहलों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अलावा, एफएसएसएआई ने ‘मोटापा रोकें, मोटापा भगाएं-मोटापा रोकने हेतु जागरूकता पहल’ अभियान शुरू किया है। मन की बात मासिक कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोटापे की समस्या के बारे में देशवासियों से चर्चा कर चुके हैं।

आर्थिक समीक्षा में बच्चों में डिजिटल व्यसन की बढ़ती समस्या पर प्रकाश डाला गया है। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि इंटरनेट मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफार्म पर बच्चों और किशोरों की बढ़ती निर्भरता उनके मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई और सामाजिक जीवन पर बुरा असर डाल रही है। डिजिटल व्यसन लगातार विचलन, ‘नींद की कमी’ और कम एकाग्रता के कारण शैक्षणिक प्रदर्शन और कार्यस्थल की उत्पादकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। विविध भारतीय एवं वैश्विक अध्ययनों ने 15-24 वर्ष के युवाओं में सोशल मीडिया के बढ़ते व्यसन की पुष्टि की है। सोशल मीडिया के व्यसन का जुड़ाव घबराहट, अवसाद, आत्मविश्वास में कमी और साइबर बुलिंग से उपजे दबाव के साथ भी है।

भारतीय युवाओं को परेशान करने वाली अन्य समस्याओं में कंपल्सिव स्क्रॉलिंग, सामाजिक तुलना और गेमिंग से जुड़ी विकृतियां शामिल हैं। ये समस्याएं किशोरों में नींद की कमी, आक्रामकता, सामाजिकता में कमी और अवसाद को जन्म देती हैं। गौरतलब है कि दुनियाभर में छोटे बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया को खतरनाक बताया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया और फिनलैंड ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंटरनेट मीडिया पर प्रतिबंध के लिए जहां कानून लागू कर रखा है, वहीं फ्रांस की नेशनल असेंबली में ऐसा कानून लाने पर सहमति बनी है। वहीं ब्रिटेन, डेनमार्क और ग्रीस इस मुद्दे पर व्यापक अध्ययन कर रहे हैं।

दुनिया के दूसरे नंबर के स्मार्टफोन बाजार, भारत के लिए ये खास चिंता का विषय इसलिए भी है, क्योंकि देश में सालाना 75 करोड़ से ज्यादा स्मार्टफोन बिकते हैं। रिसर्च फर्म डाटारिपोर्टल के अनुसार, देश में एक अरब से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं, 50 करोड़ से ज्यादा यूट्यूब यूजर, 40 करोड़ से ज्यादा फेसबुक यूजर और 48 करोड़ से अधिक इंस्टाग्राम यूजर हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इन एप्स पर 75 प्रतिशत से ज्यादा छोटी उम्र के यूजर्स हैं। इस समस्या से निपटने के लिए सर्वेक्षण ने आनलाइन कंपनियों को उम्र सत्यापन के लिए जिम्मेदार बनाने और बच्चों के लिए सरल व सुरक्षित डिजिटल उपकरणों को बढ़ावा देने की सिफारिश की है। सर्वेक्षण में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि आंध्र प्रदेश और गोवा जैसे राज्य अपने यहां छोटे बच्चों के लिए स्मार्टफोन प्रतिबंध लागू करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का अध्ययन कर रहे हैं।

आर्थिक सर्वे का साफ संदेश है सिर्फ कम खाओ, सही खाओ कहना काफी नहीं होगा। खाने की आदतें केवल व्यक्तिगत पसंद से नहीं, बल्कि फूड सिस्टम, मार्केटिंग और उपलब्धता से भी तय होती हैं। जरूरत है कि सरकार और समाज मिलकर फूड प्रोडक्शन, रेगुलेशन, लेबलिंग, विज्ञापन और रिसर्च के लेवल पर ठोस कदम उठाएं। नीतियां अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन बदलाव की शुरुआत घर से ही होगी। बच्चों को ताजा, घर का बना खाना, फल-सब्जियां, दालें और बैलेंस डाइट देना आज सिर्फ़ पालन-पोषण नहीं, बल्कि देश के भविष्य में निवेश है। क्योंकि सच यही है आज बच्चों की थाली में क्या है, वही कल भारत की सेहत और अर्थव्यवस्था तय करेगा।

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