अगर इस पूरे इथेनॉल उद्योग को कोई लॉबी सबसे ज्यादा प्रभावित व नियंत्रित करती है तो निश्चित तौर पर यह है देश की जानी-पहचानी ‘शुगर लॉबी’, जिन्हें इन दिनों केंद्र सरकार के सबसे चहेते उद्योगपति का संरक्षण हासिल है। वैसे भी भारतीय राजनीति को चीनी या गन्ना या चीनी मिलों के पंूजीपतियों ने दशकों से नियंत्रित किया है। गन्ना किसानों की राजनीति ने खास कर महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में एक महती भूमिका निभाई है।
आज इस चीनी की जगह इथेनॉल ने ले ली है, जिसे आज की प्रचलित भाषा में ‘लिक्विड गोल्ड’ कह कर पुकारा जाता है। जब से (2014) में केंद्र में भगवा परचम लहराया है तब से ही गन्ना किसानों को मदद पहुंचाने के नाम पर और पैट्रोलियम पदार्थों के दामों में कमी लाने के नाम पर इथेनॉल की वकालत शुरू हो गई थी। बाद में धीरे-धीरे इथेनॉल लॉबी ने एक मजबूत शक्ल अख्तियार कर ली, इस लॉबी में मुख्य रूप से कृषि संबंधी हित रखने वाले कुछ दबंग राजनेता, चीनी मिल मालिक और बॉयोफ्यूल कंपनियों के नियंत्रणकर्ता शामिल हैं। अब यही लॉबी ई-20 के खेल से आगे बढ़ कर ई-22 और ई-25 जैसे पैट्रोल की वकालत कर रही है और इसके लिए सरकार पर अपनी ओर से दबाव बना रही है। हालांकि इस तथ्य से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि इथेनॉल मिश्रित पैट्रोल की पैरोकारी में शुरू से ही नितिन गडकरी भी सबसे आगे रहे हैं।
कौन कमा रहा है फायदा?
इथेनॉल उत्पादन में सिंगापुर स्थित दो बड़े उद्योगपतियों की सबसे बड़ी भूमिका है। इनमें से एक की कंपनी प्रतिदिन 2000 किलोलीटर तो दूसरे की 1250 किलोलीटर इथेनॉल का उत्पादन करती है। इनमें से एक कंपनी ‘रेणुका शुगर’ को ‘विल्मर समूह’ ने 2018 में खरीद लिया था। मलेशिया के पॉम ऑयल किंग कहे जाने वाले कुक खॉन होंग की विल्मर कंपनी में अभी हाल के दिनों तक अपने देश के एक चर्चित उद्योगपति की साझेदारी रही है, बीते वर्ष उन्होंने एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपने को इस पार्टनरशिप से बाहर कर लिया। केंद्र सरकार की ऊर्जा नीति भी कमोबेश इन इथेनॉल उत्पादन कंपनियों को एक सुरक्षित व स्थिर बाजार उपलब्ध कराने की है, इन कंपनियों में चीनी मिलों से जुड़ी कंपनियां और एग्रोबेस्ड कंपनियां शामिल हैं। भारत सरकार ने अपनी सरकारी ऑयल कंपनियों मसलन इंडियन ऑयल, भारत पैट्रोलियम व हिंदुस्तान पैट्रोलियम को यह जिम्मेदारी सौंपी है कि वह तयशुदा मात्रा में पैट्रोल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग करें। अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार मौजूदा वक्त में कोई 550 कंपनियों से इथेनॉल खरीदती है। सबसे खास बात तो यह कि इथेनॉल उत्पादन कंपनियों को अपने लिए बाजार भी नहीं ढूंढना पड़ता, क्योंकि सरकार पहले से ही उसके दरवाजे बैठी रहती है।
हमारा अनाज निगल रहा इथेनॉल
सिर्फ गन्ना ही क्यों मक्का और टूटा चावल भी बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन की बलि चढ़ रहा है। सरकार उद्योगपतियों को नई डिस्टलरी लगाने के लिए और इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता भी दे रही है। इस योजना का खासकर चीनी मिल मालिकों को खूब फायदा पहुंच रहा है। इस वक्त यूपी की शुगर लॉबी का भी खूब बोलबाला है, इनमें बलरामपुर चीनी, त्रिवेणी और डालमिया भारत का प्रमुखता से नाम लिया जा सकता है। यंू तो भारत पूरी दुनिया में चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है, पर इथेनॉल को प्रमोट करने के चक्कर में ‘डीजीएफटी’ ने चीनी की भी भेंट चढ़ा दी है।
अब इस नियामक ने निर्यात के लिए चीनी को प्रतिबंधित श्रेणी से (इसमें निर्यात पर कुछ समय के लिए रोक रहती है) नििषद्ध श्रेणी में ट्रांसफर कर दिया है। यानी अब भारत चीनी के निर्यात बाजार से पूरी तरह बाहर हो गया है। जिसके कारण अब अंतर्राष्ट्रीय बाजार की निर्भरता बहुत हद तक ब्राजील पर रह गई है। अब चूंकि शुगर लॉबी ने इथेनॉल को ‘लिक्विड गोल्ड’ घोषित कर दिया है सो, अब गन्ना के बाद इथेनॉल आपूर्ति पूरी करने के लिए अनाजों का दोहन भी शुरू हो गया है। एआईडीए यानी ऑल इंडिया डिस्टलर्स एसोसिएशन के एक आंकड़े के मुताबिक वर्तमान में इथेनॉल की कुल आपूर्ति 717 करोड़ लीटर रही है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा यानी 67 प्रतिशत तो केवल अनाज के दोहन का है। सो, आने वाले दिनों में अगर देश में चीनी के साथ-साथ अनाजों की कीमतों में भी इजाफा हो जाए तो इसका दोष अकेले गडकरी को मत दीजिएगा, लाभार्थी उनसे कहीं ज्यादा बड़े हैं।
प्रधान की प्रधानी गई, पर हक्कानी नहीं
सियासत में ऐसा कम देखने को मिलता है कि शह-मात के खेल में जो बाजीगर जमीन चाट रहे होते हैं, पर उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता फिर भी अक्षुण्ण बनी रहे। ‘जेन ज़ी’ के 36 दिनों तक चले तूफानी आंदोलन में भले ही तत्कालीन िशक्षा मंत्री प्रधान जी के मंसूबों का दीया बुझ गया हो, पर अपने इस्तीफे के बाद जब वे संसद परिसर पहुंचे तो उनका स्वागत मिथिला फाग, जयकारों व फूल-मालाओं के साथ हुआ, और वह भी भाजपा सांसदों के हाथों। लोग सोच रहे थे कि प्रधान का हश्र भी अपने पूर्ववर्ती िशक्षा मंत्रियों यानी स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर या निशंक जैसा होगा। पर प्रधान ने इस प्रचलित अवधारणाओं को झुठला दिया, क्योंकि उनके पीछे भाजपा एक चट्टान की भांति अडिग थी।
शायद यही वज़ह थी कि जब सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर जेपी नड्डा व डॉ. जितेंद्र सिंह कॉकरोच पार्टी के रांका व सौरव दास से बात कर रहे थे तो उन्हें बार-बार ये समझाने की कोशिश की जा रही थी कि ‘वे प्रधान को शिक्षा मंत्रालय से हटा कर कहीं और भेज देते हैं’, पर कॉकरोच पार्टी प्रधान के इस्तीफे से कम पर राजी नहीं हुई। अब यह माना जा रहा है कि भगवा पार्टी प्रधान को ठंडे बस्ते में डालने के बजाए उनका महिमा मंडन करेगी। इसके लिए दो थ्योरी पर बात चल रही है, एक यह है कि उन्हें संगठन में पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना कर यूपी का प्रभार सौंप दिया जाए, वहीं प्रधान की दिली इच्छा अपने गृह प्रदेश लौटने की है, तो क्या उन्हें मांझी की जगह ओडिशा का अगला मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है? पर इसके लिए यह देखना जरूरी होगा कि इस पूरे मामले पर भाजपा की क्या राय है?
सूत्रों की मानें तो पार्टी सांसदों के इस कृत्य से भाजपा कतई खुश नहीं कि जिस अंदाज में उन्होंने संसद परिसर में प्रधान का स्वागत किया गया। भाजपा को लगता है इससे पार्टी को लेकर युवा पीढ़ी में खासकर ‘जेन ज़ी’ में एक नकारात्मक संदेश जा सकता है। क्योंकि नीट पेपर लीक की वज़ह से इतने बच्चों की जान चली गईं और हम उसके सूत्रधार का भाल तिलक कर रहे हैं। कहते हैं प्रधान का इस्तीफा लेने में भाजपा के बड़े नेताओं की एक महती भूमिका थी, सूत्र बताते हैं कि जब ‘जेन ज़ी’ आंदोलन अपने पूरे उफान पर था तो भाजपा नेताओं ने पुलिस व खुफिया विभाग के शीर्ष अधिकारियों से इस पूरे मामले की जानकारी मांगी थी। तब आईबी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि ‘जेन ज़ी’ का यह आंदोलन पूरे देश में आग की तरह फैल रहा है, खास कर मुंबई, पुणे, सतारा, पटना, प्रयागराज आदि शहरों में तो यह विस्फोटक मुहाने पर है, इसे यदि यूं ही बेलगाम छोड़ दिया गया तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। कहते हैं उसी वक्त प्रधान से बइस्तीफा सौंपने को कह दिया गया। यह बात संभवतः 24 जुलाई की है और अगली ही सुबह यानी 25 जुलाई को प्रधान अपने इस्तीफे के साथ हाजिर थे।
…और अंत में
कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला को यूं अचानक क्या हो गया कि उन्होंने अपने एक्स अकाऊंट के बॉयो से ‘नशनल स्पोक्सपर्सन बीजेपी’ का पद हटा दिया और वे अज्ञातवास में चले गए। यह भी कहा जा रहा है कि उन्होंने भाजपा भी छोड़ दी है। सूत्रों की मानें तो शहजाद भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की आंखों के तारे हुआ करते थे, उन्हें नड्डा ने न केवल प्रमुखता दी बल्कि पार्टी में आगे भी बढ़ाया। जब से पार्टी की कमान नितिन नबीन के हाथों में आई है कहते हैं पूनावाला के बोलने का अंदाज अध्यक्ष जी को रास नहीं आ रहा।
यह भी सुनने में आ रहा है कि शहजाद को अपने लिए एक अदद राज्यसभा की आस थी, पर पार्टी हाईकमान ने यह कहते हुए उनके अरमानों पर पानी फेर दिया कि ‘वे बहुत जल्दी न करें।’ सूत्र यह भी बताते हैं कि शहजाद अपने किसी मित्र उद्योगपति का काम लेकर एक भाजपा शासित सीएम के पास पहुंच गए थे, सीएम साहिब ने फिर यह बात दिल्ली को बता दी और फिर पार्टी महासचिव बीएल संतोष ने शहजाद की क्लास लगा दी, जिससे उनका भाजपा से मोह भंग हो गया।
‘शुगर लॉबी’ का इथेनाल पर नियंत्रण
Summary :
अगर इस पूरे इथेनॉल उद्योग को कोई लॉबी सबसे ज्यादा प्रभावित व नियंत्रित करती है तो निश्चित तौर पर यह है देश की जानी-पहचानी ‘शुगर लॉबी’, जिन्हें इन दिनों केंद्र सरकार के सबसे चहेते उद्योगपति का संरक्षण हासिल है। वैसे भी भारतीय राजनीति को चीनी या गन्ना या चीनी मिलों के पंूजीपतियों ने दशकों से नियंत्रित किया है। गन्ना किसानों की राजनीति ने खास कर महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में एक महती भूमिका निभाई है। आज इस चीनी की जगह इथेनॉल ने ले ली है, जिसे आज की प्रचलित भाषा में ‘लिक्विड गोल्ड’ कह कर पुकारा जाता…



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