Trump Strait of Hormuz Request: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उनके चार कारीबों दोस्तों ने बड़ा झटका दिया है। दरअसल ईरान और अमेरिका के बीच जारी खींचतान के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों से Strait of Hormuz (समुद्री मार्ग) की सुरक्षा में मदद मांगी थी। लेकिन जिन देशों से अमेरिका को साथ की उम्मीद थी, उन्होंने खुलकर समर्थन देने से बचने का रास्ता चुना। इससे ट्रंप को कूटनीतिक स्तर पर बड़ा झटका लगा है।
Trump Strait of Hormuz Request: क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ी मात्रा में तेल और गैस इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। यही वजह है कि इस जलमार्ग में किसी भी तरह का तनाव पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार पर असर डाल सकता है। अमेरिका का कहना है कि जब इतने देशों का व्यापार और तेल इस रास्ते पर निर्भर है, तो इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सभी देशों को मिलकर उठानी चाहिए।
ट्रंप ने क्या अपील की?
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और दूसरे देशों से अपील की कि वे भी अपने नौसैनिक जहाज इस इलाके में भेजें। ट्रंप का तर्क था कि अमेरिका लंबे समय से दुनिया के कई देशों के समुद्री हितों की रक्षा करता आया है, लेकिन अब बाकी देशों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आखिर अमेरिका ही हर बार आगे क्यों आए।
Japan Statement on Strait of Hormuz: जापान ने साफ किया रुख

ट्रंप को सबसे बड़ा झटका जापान से मिला। जापान सरकार ने साफ कह दिया कि वह फिलहाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी समुद्री सुरक्षा मिशन में शामिल होने पर विचार नहीं कर रही है। जापानी प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से कहा गया कि अमेरिका की तरफ से अभी कोई औपचारिक अनुरोध नहीं मिला है। साथ ही मौजूदा हालात में अपनी नौसेना भेजना आसान फैसला नहीं है। जापान की स्थिति इसलिए भी अलग है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतें खाड़ी क्षेत्र और ईरान से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में वह किसी सीधे टकराव की स्थिति से बचना चाहता है।
ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया भी पीछे हटे
ऑस्ट्रेलिया, जिसे अक्सर अमेरिका का मजबूत सहयोगी माना जाता है, उसने भी साफ संकेत दिए कि वह इस मिशन में युद्धपोत नहीं भेजेगा। वहीं दक्षिण कोरिया ने नरम भाषा अपनाई, लेकिन उसका रुख भी लगभग वैसा ही रहा। सियोल ने कहा कि वह मामले की समीक्षा करेगा, पर फिलहाल जहाज भेजने की कोई ठोस योजना नहीं है। इससे साफ हो गया कि अमेरिकी अपील का असर सहयोगी देशों पर अपेक्षा के मुताबिक नहीं पड़ा।
यूरोपीय देशों की भी दूरी
ब्रिटेन और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों ने भी इस मुद्दे पर सावधानी बरती। ये देश नहीं चाहते कि वे अमेरिका की ईरान नीति के कारण किसी बड़े सैन्य टकराव का हिस्सा बनें। उनका मानना है कि इस तरह के कदम से पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए उन्होंने खुलकर सैन्य सहयोग देने से परहेज किया।
अमेरिका की छवि पर सवाल
एक्सपर्ट के अनुसार, यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका के प्रभाव में कमी की ओर इशारा करती है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति घरेलू राजनीति में भले लोकप्रिय रही हो, लेकिन वैश्विक सहयोग जुटाने में यह रणनीति कमजोर पड़ती दिख रही है। होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी अमेरिका अपने पुराने सहयोगियों को साथ नहीं ला पाया। कुल मिलाकर, यह मामला दिखाता है कि दुनिया के बड़े देश अब हर मुद्दे पर अमेरिका के साथ खड़े होने को तैयार नहीं हैं, खासकर तब जब मामला सीधे युद्ध या सैन्य जोखिम से जुड़ा हो।
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