भारत में जन्मे हर व्यक्ति को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने और सरकार चुनने के लिए मतदान करने का अधिकार है। वोट देने का अधिकार न केवल संवैधानिक है, बल्कि भावनात्मक भी है। लोकतांत्रिक सरकार के चुनाव के लिए सहभागी प्रक्रिया में भाग लेना राष्ट्रीयता और देशभक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति है। चुनाव आयोग का यह दायित्व है कि वह मतदाता सूची में हर जायज मतदाता का नाम शामिल करे। निर्वाचन आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में एसआईआर में 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे जाने के बाद बवाल मचा हुआ है। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में उन वोटरों को मतदान की इजाजत देने से इंकार कर दिया है, जिनके नाम एसआईआर में काटे गए हैं और उनकी शिकायतें अपीलीय ट्रिब्यूनलों में लम्बित हैं। 11 अप्रैल तक 34 लाख से अधिक अपीलें दायर की जा चुकी हैं जिनका फैसला आना बाकी है। स्पष्ट है कि चुनावों से 10 दिन पहले इस स्टेज पर सुप्रीम कोर्ट भी चुनाव प्रक्रिया में कोई दखल नहीं दे सकता। क्योंकि अगर ऐसे ही आपत्तियां आती रहीं तो चुनाव कैसे होंगे।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जायमाल्या बागची ने चुनाव आयोग पर तीखे सवाल दाग दिए और उन्होंने पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची के एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर गम्भीर चिंता जता दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस बागची की पीठ उन लोगों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्हें वोटर लिस्ट से बाहर किया गया है। चुनाव अधिकारियों की ओर से खारिज की गई विवादित अपीलों की सुनवाई के लिए पूर्व जजों के नेतृत्व में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जिनमें से एक की अध्यक्षता कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस कर रहे हैं। बनाए गए 19 ट्रिब्यूनलों में से अधिकांश ने काम शुरू ही नहीं किया। याचिकाकर्ताओं ने वोटर लिस्ट फ्रीज करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर वोट डालने की अनुमति मिल जाती है तो वे विधानसभा चुनाव में वोट डाल सकेंगे। जस्टिस बागची ने बहुत महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि अगर जीत का मार्जन लिस्ट से बाहर किए गए मतदाताओं से प्रतिशत से कम हुआ तो, उन्होंने कहा, ‘अगर 10 प्रतिशत लोग वोट नहीं करते हैं और जीत का मार्जिन 10 प्रतिशत से ज्यादा हुआ तो क्या होगा। अगर जीत का मार्जिन 2 प्रतिशत है और वोट न करने वाले 15 प्रतिशत हैं, तब क्या होगा? हम कोई राय व्यक्त नहीं कर रहे हैं, लेकिन हमें अपना दिमाग इस्तेमाल करने की जरूरत है।’ जस्टिस बागची ने कहा कि बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया बाकी राज्यों से अलग है और यहां चुनाव आयोग ने एक नई कैटेगरी लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी शुरू की है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग यहां एसआईआर में लागू उस प्रक्रिया का भी पालन नहीं कर रहा है, जिसमें कहा गया था कि 2002 के चुनावों में वोट करने वालों को अपने दस्तावेज अपलोड करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि एसआईआर के नोटिस में भी यह बात लिखी है।
पीठ ने यह भी कहा कि आपत्तियों और दावों की जांच कर रहे न्यायिक अधिकारियों से 100 प्रतिशत सही फैसलों की उम्मीद कैसे की जा सकती है जबकि तय समय सीमा के अन्दर एक-एक अधिकारी हर दिन 1000 दस्तावेजों की जांच कर रहा है, ऐसे में 70 प्रतिशत सटीकता की भी उत्कृष्ट मान लिया जाए तो भी गलती होने की गुंजाइश हमेशा रहेगी। इसलिए राज्य में एक मजबूत अपीलीय तंत्र की जरूरत है। पीठ ने यह भी कहा कि कहीं न कहीं हम आने वाले चुनाव की धूल और गुस्से में अंधे हो रहे हैं।
देश की शीर्ष अदालत द्वारा निर्वाचन आयोग पर सवाल खड़े करने के बाद पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कांग्रेस और अन्य दल चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर संदेह के बादल गहराते जा रहे हैं। चुनावी लोकतंत्र में विश्वास का संकट खड़ा हो गया है। निष्पक्षता के अभाव में इसका प्रभाव नागरिक भागीदारी, मतदान के प्रतिशत और सामाजिक एकता पर पड़ता है। भारत में चुनावी लोकतंत्र की मजबूती, उसके नागरिकों के निष्पक्षता पर, विश्वास पर निर्भर करती है। इस विश्वास के संवैधानिक संरक्षक के रूप में चुनाव आयोग को कानूनी अनुपालन से आगे बढ़कर संस्थागत साख को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। बेहतर यही होगा कि अपीलीय ट्रिब्यूनल समावेश के सिद्धांत के आधार पर अपीलों को सुने। फिलहाल काटे गए मतदाताओं के सामने ट्रिब्यूनल के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इतना तय है कि यह काम अब चुनाव के बाद ही होगा।


















