मोदी सरकार का नया महिला आरक्षण संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर चुका है, जिसके लिए सदन में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी। जाहिर है कि सत्तारूढ़ एनडीए की 543 सदस्यीय लोकसभा में कुल संख्या 293 होने की वजह से यह विधेयक तब तक पारित नहीं हो सकता था जब तक कि विपक्ष के सांसद इसका समर्थन न करते। अतः विपक्ष के विरोध करने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। मगर विपक्षी नेता राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव व सुश्री ममता बनर्जी तक यह घोषणा कर रहे हैं कि वे महिला आरक्षण के हक में हैं और उनके द्वारा ताजा आरक्षण विधेयक-2026 का विरोध चुनाव क्षेत्र परिसीमन से जुड़ा हुआ है। यहां यह समझने की जरूरत है कि विपक्ष के विरोध करने के मूल तर्क क्या हैं? पहला तर्क यह है कि 2023 में ही महिला आरक्षण विधेयक पारित हो चुका है। उस समय समूचे विपक्ष ने इसका समर्थन किया था और विधेयक सर्वसम्मति से दोनों सदनों ( लोकसभा व राज्यसभा ) में पारित हुआ था। अतः कांग्रेस की नेता श्रीमती प्रियंका गांधी कह रही हैं कि सरकार को नया विधेयक लाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे वह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक मंशा को बता रही हैं और कह रही हैं कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर देश भर के चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन अपनी राजनीतिक सहूलियत के आधार पर कराना चाहती है और उल्टे विपक्ष को बदनाम करना चाहती है।
इसी के समानान्तर राहुल गांधी कह रहे हैं कि भाजपा महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन इस प्रकार कराने की योजना बना रही है जिससे इसका राज कभी खत्म ही न हो। हालांकि समूचे विपक्ष की राय यही है मगर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का यह कहना है कि महिलाओं के लिए किये जा रहे 33 प्रतिशत आरक्षण में पिछड़े वर्ग व मुस्लिम महिलाओं के लिए भी उनकी जनसंख्या के अनुसार आरक्षण हो। भारत का संविधान चुंकि धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता है अतः मुस्लिम स्त्रियों के आरक्षण का सवाल ही पैदा नहीं होता। अब सवाल यह है कि मोदी सरकार नया महिला संविधान संशोधन आरक्षण विधेयक 2026 क्यों लाई जबकि पुराना 2023 का विधेयक जीवित था? इस बारे में भाजपा का तर्क है कि पुराने कानून में यह कहा गया था कि 33 प्रतिशत आरक्षण देश में नई जनगणना के बाद होने वाले चुनाव क्षेत्र परिसीमन के बाद ही हो सकता है अतः 2029 तक के चुनावों तक आरक्षण को लागू करने हेतु चुनाव परिसीमन जल्दी होना चाहिए और यह 2011 की जनगणना के आधार पर कर दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाकर 850 कर दी जानी चाहिए और उसमें से 33 प्रतिशत आरक्षण दे देना चाहिए। विपक्ष इसके जवाब में कह रहा है कि पहले तो यह 850 का आंकड़ा कहां से आया और दूसरे वर्तमान सदस्य संख्या 543 में ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण क्यों नहीं दिया जा सकता? (हालांकि गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने बढ़ी हुई संख्या का फार्मूला भी सदन में खोल दिया) वैसे 2023 में भी विपक्ष ने यही मांग की थी मगर तब सरकार ने इसे जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया था। वैसे देश में जनगणना का दो चरणीय काम शुरू हो चुका है। पहले चरण में कुल घरों की जनगणना की जायेगी और दूसरे में प्रत्येक नागरिक की गणना के साथ ही उसकी जाति भी पूछी जायेगी। मगर यह कार्य 2027 के आिखर तक ही पूरा हो पायेगा। इसके बाद परिसीमन का काम शुरू होगा। पेंच केवल इतना सा है कि मोदी सरकार इस परिसीमन से छुटकारा पाते हुए सीधे 2011 की गणना के आधार पर परिसीमन आयोग गठित करके चुनाव क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण चाहती थी जो कि विपक्ष को मंजूर नहीं था। इसके साथ ही गृहमन्त्री श्री अमित शाह यह आश्वासन भी दे रहे थे कि लोकसभा में उत्तर व दक्षिण के राज्यों की आनुपातिक संख्या बढ़ी हुई लोकसभा सदस्य संख्या में बरकरार रखी जायेगी। इसके साथ ही दक्षिण भारत की प्रमुख द्रमुक व वामपंथी पार्टियां जमकर विरोध कर रही हैं और कह रही हैं कि सरकार की असली मंशा चुनाव क्षेत्र परिसीमन की है वरना वह अपने ही पुराने कानून की जगह नया कानून बनाने पर क्यों आमादा होती। जहां तक पुराने 2023 के महिला आरक्षण का कानून का सम्बन्ध है तो वह जीवित है क्योंकि मोदी सरकार ने नये विधेयक को लोकसभा में विपक्ष का समर्थन न मिलते देख इसे गत 16 अप्रैल की रात से लागू कर दिया है। अतः यह स्पष्ट होना चाहिए कि महिला आरक्षण का कानून भारत में जिन्दा है जिसका क्रियान्वयन 2027 की जनगणना के बाद बनने वाले परिसीमन आयोग की सिफारिशों के बाद होगा।
मजेदार तथ्य यह भी है कि 2023 में विपक्ष आरक्षण को नये परिसीमन से जोड़े जाने का विरोध कर रहा था मगर तब मोदी सरकार इस पर अड़ी हुई थी । इसके बावजूद विधेयक सर्वसम्मति से पारित हो गया था। फिलहाल भारत के पांच राज्य चुनावी मुद्रा में हैं जिनमें से दो तमिलनाडु व प. बंगाल में चुनाव आगामी 23 व 29 अप्रैल को होने हैं अतः इन राज्यों में सत्तारूढ़ व विपक्षी दल महिला आरक्षण को एक मुद्दा बना सकते हैं और एक-दूसरे पर अपने-अपने तर्कों के अनुसार आरोप-प्रत्यारोप लगा सकते हैं। हालांकि पूरे मामले में बीसियों कानूनी पेंच हैं मगर इस पूरे मामले को इस तरह भी समझ सकते हैं कि महिला आरक्षण का कानून 2023 में बन चुका है मगर यह 2029 के बाद ही लागू हो सकेगा क्योंकि तब तक जनगणना के बाद बनने वाले परिसीमन आयोग का काम पूरा नहीं हो पायेगा। इसलिए इस मुद्दे पर सरकार अपना सिर ऊंचा रख रही है और विपक्ष कह रहा है कि देर किस बात की। मौजूदा लोकसभा सदस्य संख्या में ही 33 प्रतिशत आरक्षण दे दो और 2023 के कानून में संशोधन कर दो। अब तो जनता ही इन दांव-पेंचों को खोल सकती है,
देखिये लाती है उस शोख की नखवत क्या रंग
उसकी हर ‘बात’ पे हम ‘नामे खुदा’ कहते हैं।





















