Congress Boycotts Haryana Assembly Special Session : सोमवार की सुबह चंडीगढ़ में मौसम वैसे ही तीखा था जैसा हरियाणा की सियासत बेरहम, जलाने वाला और बेचैन कर देने वाली थी, लेकिन उस तपती धूप में जो नज़ारा विधानसभा भवन के बाहर देखने को मिला, वह हरियाणा की राजनीतिक इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा.
एक तरफ विधानसभा भवन के भीतर सत्तारूढ़ भाजपा सरकार का विधानसभा सत्र चल रहा था, तो दूसरी तरफ भवन के ठीक बाहर खुले आसमान के नीचे, चिलचिलाती धूप में नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपने विधायकों के साथ कुर्सियाँ डालकर बैठे थे और चला रहे थे अपना ‘समानांतर सत्र’.
यह हरियाणा के विपक्ष का वह कड़ा और ऐतिहासिक संदेश था, जो 2009 के बाद पहली बार इस रूप में सामने आया था।
सुबह की बैठक से शुरू हुई बगावत की कहानी

कहानी शुरू होती है उस सुबह से, जब विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले कांग्रेस विधायक दल यानी CLP और BAC (विधानसभा परामर्श समिति) की संयुक्त बैठक हुई. बैठक की शुरुआत में ही माहौल गरम था. विपक्षी विधायकों ने BAC में सरकार से एजेंडे की कॉपी माँगी . वह कॉपी जिसमें बताया जाता है कि सत्र में क्या-क्या पेश होगा, क्या बिल लाए जाएंगे, क्या प्रस्ताव रखे जाएंगे.
लेकिन हुड्डा के अनुसार सरकार ने वह कॉपी देने से इनकार कर दिया. सत्र शुरू होने के 10 मिनट पहले तक भी संकल्प पत्र विपक्ष को नहीं सौंपा गया. इसे विपक्ष ने न केवल अपमान माना, बल्कि सत्र की पारदर्शिता पर भी सीधा सवाल उठाया.
“हम इस सत्र का बहिष्कार करेंगे”

हुड्डा ने साफ शब्दों में कहा, “सरकार अपनी मर्ज़ी से सत्र नहीं बुला सकती. यह जनता के खून-पसीने की कमाई है. हम प्रदेश की जनता पर TA-DA के खर्च का बोझ नहीं डालना चाहते.”
विपक्ष का दावा था कि यह सत्र असंवैधानिक है.
विपक्ष का बहिष्कार महज़ एजेंडे की कॉपी न मिलने तक सीमित नहीं था। इसके पीछे कई गहरे संवैधानिक और राजनीतिक सवाल भी थे. हुड्डा ने आरोप लगाया कि आचार संहिता लागू होने के दौरान विधानसभा सत्र बुलाना असंवैधानिक है. उन्होंने कहा कि यह सत्र विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और सरकार इसे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है.
वरिष्ठ कांग्रेस नेता राव नरेंद्र ने भी इस बात को पुरज़ोर तरीके से उठाया. उन्होंने कहा कि जो विषय इस सत्र में उठाया जा रहा है- ‘महिला आरक्षण’, वह मूल रूप से केंद्र सरकार का विषय है, न कि राज्य सरकार का. ऐसे में राज्य विधानसभा में इसे लाना न केवल राजनीतिक है, बल्कि भ्रामक भी है.
बाहर लगी ‘जनता की विधानसभा’

जब भीतर सत्र शुरू हुआ, तो बाहर हुड्डा ने अपने विधायकों के साथ कुर्सियाँ लगाईं और शुरू हो गई उनकी ‘समानांतर विधानसभा’. विधायक रघुवीर कादयान को इस बाहरी सत्र का अध्यक्ष बनाया गया. विपक्षी विधायक एक-एक करके बोले, मुद्दे उठाए, सरकार की नीतियों पर सवाल किए.
हुड्डा ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने और उनके विधायकों ने विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई. इसका सीधा मतलब था कोई TA नहीं, कोई DA नहीं, जनता का एक भी पैसा बर्बाद नहीं. यह प्रतीकात्मक कदम था लेकिन इसका संदेश बहुत गहरा था कि “हम सत्ता के लिए नहीं, सिद्धांत के लिए लड़ते हैं.”
महिला आरक्षण बिल चुनावी दांव
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में था महिला आरक्षण बिल. सरकार इस सत्र में इससे जुड़ा एक प्रस्ताव लाई थी. लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बी. बी. बत्रा ने इसकी कड़ी आलोचना की. उन्होंने याद दिलाया कि महिला आरक्षण की लड़ाई कांग्रेस की पुरानी लड़ाई है.
1996 में कांग्रेस बिल लाई — लैप्स हो गया
1998 में फिर प्रयास हुआ — लैप्स हो गया
1999 में एक बार और — लैप्स हो गया
2008 और 2010 में भी कांग्रेस ने यह मुद्दा उठाया
और फिर 2023 में केंद्र में 33% महिला आरक्षण का बिल पास हुआ — जिसका कांग्रेस ने पूरे दिल से समर्थन किया।
बत्रा का सवाल था “अगर बिल 2023 में पास हो गया था, तो 2026 तक क्यों लटकाए रखा? तीन साल तक क्या होता रहा?” बत्रा ने आरोप लगाया कि इस बिल के पीछे “बड़ी साज़िश” थी, असली मकसद था डीलिमिटेशन और सीटें बढ़ाना. उन्होंने कहा, “वंदे मातरम और महिला आरक्षण’ ये ऐसे मुद्दे हैं जो संविधान में जहां वैधता नहीं, वहाँ से उठाए जाते हैं. यह बिल गिरना भाजपा के लिए बहुत बड़ा सबक है.”
इस मौके पर हुड्डा ने भी तीखे शब्दों में कहा, “आज जो प्रस्ताव लाया जा रहा है, हम उसकी निंदा करते हैं. यह सरकार के पिछले दरवाज़े से आ रहे निर्देशों का नतीजा है.”























