मां, मातृभूमि और जगन्माता को प्रणाम करते हुए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के क्रियान्वयन हेतु 16 से 18 अप्रैल, 2026 तक लोकसभा में विशेष सत्र आयोजित किया जा रहा है। यह केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक है। देश की लगभग 50 प्रतिशत महिला जनसंख्या के सशक्तीकरण का यह महत्वपूर्ण कदम अब साकार रूप लेने जा रहा है। सितंबर, 2023 में नए संसद भवन में पारित यह अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीय महिलाओं की दशकों पुरानी आकांक्षा की पूर्ति है।
स्वतंत्रता के लगभग 78 वर्षों बाद महिलाओं को वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में यह एक निर्णायक पहल है। वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2023 तक, अनेक सरकारें और 7 प्रधानमंत्री इस विधेयक को पारित कराने में असफल रहे परंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में यह संभव हो सका। 8 अप्रैल, 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, जिनमें वर्ष 2011 की जनगणना को आधार बनाना, लोकसभा में सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 816 करना तथा लगभग 273 सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित करना शामिल है, साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिए भी आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।
यह सत्र इस अधिनियम को पूर्ण रूप से लागू कर वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव में 33% महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में निर्णायक साबित होगा। जब इतिहास लिखा जाएगा तो यह दर्ज होगा कि भारत की आधी आबादी को संवैधानिक सम्मान देने का साहस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दिखाया। यह अधिनियम केवल प्रावधानों का संग्रह नहीं, बल्कि उस दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है, जिसने इसे संभव बनाया। वर्ष 2023 में यह विधेयक लोकसभा में 454 और राज्यसभा में 214 मतों से पारित हुआ जो व्यापक समर्थन को दर्शाता है।
पुरुष हो या महिला, किसी भी अन्य व्यवसाय में उसकी भूमिका सीमित ही होती है लेकिन राजनीति असीमित संभावनाओं से भरी होती है और इसलिए एक महिला वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला बदल सकती है, एक शिक्षिका अपनी कक्षा बदल सकती है परन्तु एक महिला सांसद पूरे देश की दिशा बदल सकती है। इसलिए 273 सीटों का आरक्षण केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक सशक्त और समावेशी भविष्य की नींव है और महिलाओं के समग्र सशक्तीकरण की कुंजी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिला, उन्होंने राष्ट्र को नई दिशा दी। अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मीबाई, रज़िया सुल्तान, इंदिरा गांधी और आज निर्मला सीतारमण जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं। इन महिलाओं ने अपने नेतृत्व से समाज और राष्ट्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
यदि आंकड़ों पर नजर डालें, तो वर्ष 1952 की पहली लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 4.4% था, जो कई दशकों तक बहुत धीमी गति से बढ़ा। वर्ष 2024 की 18वीं लोकसभा में यह संख्या लगभग 14% तक पहुंची है। राज्यसभा में भी महिलाओं की भागीदारी लगभग 15% के आसपास है। यह प्रगति सराहनीय है परंतु वैश्विक औसत की तुलना में अभी भी अपर्याप्त है। यही कारण है कि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ जैसे प्रयास आवश्यक हैं जो महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित स्थान दिला सकें। मतदाता के रूप में भी महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह सुखद आश्चर्य है कि वर्ष 2019 के चुनाव में पुरुषों और महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगभग समान रहा। यह राजनीतिक जागरूकता और भागीदारी का सकारात्मक संकेत है।
पिछले कुछ वर्षों में नरेंद्र मोदीजी के नेतृत्व में भारत ने महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक नया अध्याय रचा है। उनकी नीतियों और संकल्प ने नारी शक्ति को केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि सामर्थ्य और स्वाभिमान भी प्रदान किया है। उज्ज्वला योजना के माध्यम से धुएं से मुक्ति पाकर ग्रामीण महिलाओं ने स्वस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाया, जन-धन योजना ने उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता का आत्मविश्वास दिया। आज स्कूली शिक्षा में छात्र और छात्राओं का प्रवेश प्रतिशत लगभग बराबर है और उच्च शिक्षा में भी छात्राएं 1.57 करोड़ से बढ़कर 2.18 करोड़ हो गई है। उसी प्रकार से गैर-पारंपरिक क्षेत्र जहां महिलाओं का प्रवेश तक वर्जित था, अब वहां पर भी महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ इसी परिवर्तन की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। यह केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की धुरी को संतुलित करने का प्रयास है, जिस पर समाज की दिशा और दशा निर्भर करती है। यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही है, जिसने नारी को सत्ता के गलियारों में सम्मानपूर्वक प्रवेश की भूमिका रच डाली और इस पर भी आलोचक चुप नहीं रहे और उन्होंने मोदी सरकार की यह कहकर आलोचना की कि यह अधिनियम वर्ष 2034 से पहले लागू ही नहीं होगा, परंतु 8 अप्रैल, 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तीन संशोधन विधेयकों को मंजूरी देकर सबको उचित जवाब दिया। सरकार ने वर्ष 2027 की जनगणना की प्रतीक्षा किए बिना वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन का साहसिक निर्णय लिया जिससे यह आरक्षण वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों में ही लागू हो सकेगा। यह निर्णय मोदी सरकार की कार्य-संस्कृति का दर्पण है – “वादे से पहले काम, घोषणा से पहले तैयारी”।
इसके लिए यह अनिवार्य है कि संसद और विधानसभाओं में पहली बार आने वाली महिलाओं को उचित प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान किया जाए। केवल अवसर प्रदान करना पर्याप्त नहीं है, उन्हें सक्षम, आत्मविश्वासी और निर्णय-प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी के लिए एक सशक्त एवं सहयोगी वातावरण उपलब्ध कराना समान रूप से आवश्यक है। पितृसत्तात्मक सोच से ऊपर उठते हुए उन्हें अपनी मां, बहन, पत्नी और बेटी के राजनीतिक सफर को न केवल स्वीकार करना होगा, बल्कि सक्रिय रूप से उसका समर्थन भी करना होगा।
यही संवेदनशील, समावेशी और उत्तरदायी दृष्टिकोण एक सशक्त, सक्षम और दूरदर्शी महिला नेतृत्व के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा, जो राष्ट्रहित में प्रभावी और संतुलित निर्णय लेने में समर्थ हो। अंततः यह अधिनियम केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के लिए एक नई शुरुआत है। जब महिलाएं सशक्त होती हैं तो परिवार, समाज और राष्ट्र सभी सशक्त होते हैं। भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।
नारी शक्ति-राष्ट्र शक्ति है।
नारी का सम्मान- राष्ट्र का अभिमान है।



















